Unkaheen Baatein by Dipesh Hedamba

ज़िन्दगी के खेल…

कैसे समझाऊं ये दर्द जो सीने में कहीं छिपा रखा है,
ये ज़िन्दगी के खेल में कितने किस्से और सपने दबा रखा है…

हर रोज़ नयी सुबह खुधको कई झूठ बोल और हस कर निकाल लेती हूँ,
माँ और बाबा को भी सब ठीक है कह कर उन्हें भी मना लेती हूँ…

सपने ऊंचाई के और दिल में प्यार अब दोनों भी पहले जैसे नहीं रहे,
बहुत कुछ छोड़ आयी पीछे और हम भी पहले जैसे नहीं रहे….

ज़िन्दगी के इन् पन्नो पर कुछ कहानियां अधूरी सी रह गयी,
इन अधुरी सी कहनियो में ज़िन्दगी मुझे कई सबक दे गयी,

ढलती शाम सी मैं भी थक घर की और अपना रुख कर लेती हूँ,
कुछ इसी तरह मैं अपना दिन भी गुज़ार लेती हूँ…

2 thoughts on “ज़िन्दगी के खेल…

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