नाराज


हर बात, हर लम्हा, याद रेहने की बिमारी सी हो गई है,
क्या पता क्यू मुजे दोस्ती निभाने की आदत सी हो गई है,

कभी जो मैं ख़ुद से ख़ुश रह लिया करतार था
अब अपनो से ही “ना’’ सुनने के आदत सी हो गई है,

कभी जो लडो अपनो से ही, अपनो के लिये,
ये भुलना नहीं के आज कल दोस्ती सियासत सी हो गई है,

मशरुफ़ चल रह है सब आज कल मेरे अपने, अपनो से ही,
लागता है मेरे खिलाफ  कोई साजिश सी हो गई है,

यू अपनो के रूठे तेवर देख तकलीफ़ सी होति है,
जैसे कही सालो की दोस्ती खतम सी हो गई है,

कुछ खास ही थे अब तक जिंदगी में,
पर लगता है उनकी भी जरूरतें पुरी हो गइ है,

यू तनहा सा बैठा यहीं सोच रहा हू,
के मुझसे ऐसे कौनसी गुस्ताखी हो गई है,

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