Unkaheen Baatein by Dipesh Hedamba

इंतज़ार करते करते…


“कब होगा इंतज़ार ख़तम वो इसी ख्याल में रहते है,
दीप जला कर दुवा जिनकी सलामती की वो मांगते है,

इंतज़ार की घडी पूरी हो इसी राह में रहते है
कभी तो आयेगा बेटा उसका ये उम्मीद में वो रहते है,

सरहद पे धरती माँ की रक्षा में वो रहता है,
इसी मिटटी का है इसी मिटटी की हिफाज़त भी वो करता है,

कब होगा इंतज़ार ख़तम वो इसी ख्याल में रहते है,
दीप जला कर दुवा जिनकी सलामती की वो मांगते है,

रुखसत उसे इस बार भी न मिली कहा उसने अगली बार आऊंगा
ये सुन पिता भीलकर रोयाके क्या पता कब उसे देख पाउँगा

कब होगा इंतज़ार ख़तम वो इसी ख्याल में रहते है,
दीप जला कर दुवा जिनकी सलामती की वो मांगते है,

जंग के हालात है देश में सरहद में है तनाव बड़ा,
बेटा वाहा सुरक्षा करता और पिता उसकी राह ताकता रहा,
 
खेत बून कर पिता कुछ यु दिन गुज़ार लेते है,
बेटे की याद में दो बून्द अक्ष के भी वो छुपा लेते है,
 
कब होगा इंतज़ार ख़तम वो इसी ख्याल में रहते है,
दीप जला कर दुवा जिनकी सलामती की वो मांगते है,
 
एक संदेशा आया बेटे का खत उसने लिखा है,
जंग अब न होगी और जल्दी अब घर लौट रहा है,
 
घर आया फौजी बेटा देख पिता को भी सुकून मिला,
सूरज सा वो तेज देख पिता को बहुत गर्व हुवा,
 
हुवा आखिर इंतज़ार खत्म जिनके ख्याल में रहते थे,
दीप जला कर दुवा जिनकी सलामती की वो मांगते थे |”

14 thoughts on “इंतज़ार करते करते…

  1. I can relate to this with my brother and my mom’s feelings. My mom used to wait for my brother’s return on vacation. Nice poem. 👍🙏🙏

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